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Tuesday, 1 November 2016

स्वप्न, साथी और उलटबांसियाँ।

जीवन कभी-कभी उलटबांसी लगता है। चीज़ें उल्टी नज़र आती है।
मेट्रो में दो डिब्बों के बीच बुढिया घास की गठरी लिए मतीरा खा रही है। पुरानी दिल्ली के बाज़ार में रेतीले टीले पर चरवाहा अलगोजा बजा रहा है। अक्षरधाम मंदिर के आगे शांत रात में झींगूरों की आवाज़ें के बीच तारों से भरा आसमान चमक रहा है। पुरानी प्रेमिका अचानक से मुस्कराकर हाल पूछती है।

साथी थोड़ी देर और बालों में हाथ फिराओ ना।



फोटो- सुमेर सिंह राठौड़

Monday, 31 October 2016

फिर भी जलते दीप देखकर गाँव याद आता है

धीरे-धीरे त्यौहार बदल रहे हैं। नई चीज़ें जुड़ती जाती हैं। घर-गाँव से दूर जिन चीज़ों को याद करते हैं दरअसल वो चीज़ें अब वहां से भी गायब हैं। मिलना-जुलना, खेल-कूद, खुद की बनाई चीज़ें, घर की बनी मिठाइयाँ। सब अब गाँव में भी बाज़ार से खरीदते हैं।

बस गाँव की प्रकृति किसी-किसी कोने में बची रह गई है। पेड़-पौधे और धरती, जानवर बचे हुए हैं। वही खींचते रहते हैं।
सुमेर

Saturday, 29 October 2016

'लिसन अमाया' ज़िंदगी यादों से नहीं

"ज़िंदगी यादों से नहीं होती यादें ज़िंदगी का हिस्सा होती हैं"
यादें भी सच में रेत की तरह होती हैं। कई बार हम ज़िंदगी यादों के हिसाब से चलाने लगते हैं और उसमें हम अपने आसपास और खुद के होने को नहीं जी पाते। हमारे आस पास कितनी कहानियां हैं। कितने छोटे-छोटे खुशियों के मौके हैं। जाने क्यों हम हर जगह खरीददार बने रहते हैं, खुद नहीं होते।
'लिसन अमाया' आई लव ब्यूटिफुल सोल :)।

Thursday, 27 October 2016

जल थल जी में तू ही विराजे

अकेले नहीं होते हम कारवाँ में? राह में जो हाथ पकड़े छोड़ जाते हैं वो साथी होते हैं?
साल भर बाद अचानक से वो रास्ता रिवाइंड हो जाता है और हम ढूंढते हैं हाथ पर निशान कि अब भी राह में वो हाथ पकड़े चल रहे है।
गहराई रात में धूआं, छूटता हाथ और बैकड्रॉप में गा रहा कबीर 'जहाँ देखूं तू का तू'
सुनो इस राह में सब मुसाफिर है, नए मुसाफिर सफर मुबारक।


Monday, 8 August 2016

खोने वाले लौट आते हैं क्या?

अचानक बादल काले हो गए। हवा रुक गई, पत्तों का शोर बंद हो गया। पीला गुबार दिखने लगा। बवंडर आ गया। पंछी चिल्लाने लगे। बंवडर के साथ आई तेज बारिश। पेड़ पर सफेद गालों वाली बुलबुल गाने लगी, बूंदों के साथ जुगलबंदी करके। पत्ते झरने लगे। सब कुछ हरा था। और एक दिन बुलबुल खो गई। पत्ते झड़ गए। गर्म हवा झुलसाने लगी। जाने कब फिर बदलेगा मौसम। खोने वाले कभी तो लौट आते होंगे?
(फोटो: सुमेर)

Monday, 11 July 2016

लौटने के लिए आते हैं पर कभी लौट नहीं पाते हैं

हम चले आते हैं लौटने की ख़्वाहिशें लेकर लेकिन कभी लौट नहीं पाते।
कल डॉक्युमेंट्री देखी थी ताण बेकरो। जोगी, भील और कालबेलिया जनजातियों पर बनी है।
सवालों के जवाब देते हुए खुद पर गुस्सा आ रहा था। क्या इन जनजातियों के कोई हक़ नहीं हैं।
इनसे परम्पराएं तो छूट गई पर आधुनिक ना हो पाए। लटक गए बीच में।
कितना कठिन जीवन है बिना शिक्षा, बिजली, घर और रोटी के।
फिर भी मुस्कराते हैं।


(फोटो: सुमेर)

ये रास्ते हैं कि शतरंज की चालें

खुद के होने को ढूंढना सबसे कठिन काम है। मैं हर रात खुद को बड़ी मुश्किल से खोज निकालता और अगली शाम तक फिर से तलाश रहा होता हूं अपना वजूद।
कई बार किसी जगह हम खुद से डर जाते हैं। फिर उस जगह हम कभी सहज हो ही नहीं पाते। 
बहुत मुश्किल खेल है यह। इसे खेलने के लिए शातिर होना पड़ता है। मैं खुद को खोजता हूं तो शातिरपना मुझे नकार देता है।
(फोटो: सुमेर)

Saturday, 4 June 2016

ज़ेहन के रोजनामचे में दर्ज नाम

'मैं समय हूं।'
मैं हंसता था यह सुनकर। पर अब समय हंस रहा है। कम वक्त में चीज़ें इधर की उधर हो जाती है। रिश्तों की परिभाषा बदल जाती है।
समय जैसे रबर हो। हम पेंसिल छीलकर लिखते जाते हैं सुंदर शब्द और रब्बर मिटाता जाता है। यह कहते हुए कि लिखे को भूलकर और लिखो।
पर जो अमिट छप गया कैसे मिट सकता है। ज़ेहन के रोजनामचे में दर्ज है जो होगा हिसाब उसका।



बरगद यहां भी है पर वो छांव नहीं

टूटी पुरानी चारपाई। उस पर पड़ा मैं देखता रहता बरगद को। दिन का सबसे गर्म वक्त। बरगद के पत्तों की आवाज़ें। गौरेया और सफेद गालों वाली बुलबुल की चहचहाहट।
बरगद यहां भी होते हैं पर उनके नीचे वो छांव नहीं होती। अब गर्मियां चुभती हैं। दिन तो गुम ही हो गये। उनींदी रातें होती हैं। मशीन हुआ जाता शरीर लुढकता रहता है इधर उधर। 
कुछ तो फर्क है भले ही स्टेट ऑफ मांइड कह दो।


Monday, 2 May 2016

सफ़ेद बादल और कौओं के गीत

सुबहें चहचहाहट भूल गई। चरम पर पहुंची गर्मी में ठंडा शरीर खिड़की पर लुढका रहता है। कातर निगाहों से सफेद बादल को गुजर जाने तक तकती हैं आँखें।
सुनो किसी को झूठा इंतिज़ार कभी मत करवाना। जिसकी छोटी सी दुनिया हो उसके लिए छोटे-छोटे वादे भी बहुत बड़े होते हैं।
दोपहरों में गौरेया नहीं बोलती, कौओं के गीत उदास होते हैं। तुम दुआ करना मेरे लिए बड़ी दुनिया की ताकि छोटे वादे भूल जाऊं।

       (फोटो: सुमेर)

Sunday, 24 April 2016

समय का पहिया कभी पंक्चर नहीं होता

समय का पहिया हमेशा चकाचक रहता है। इसकी गति कभी कम होती ही नही। ना इसमें कभी हवा कम होती है और ना ही पंक्चर होता है।
कैसा भी रास्ता हो बुरा, भला, ठोकरों वाला कब निकल जाता है पता ही नहीं चलता।
हम बस उन पहियों पर सवार अपने चेहरे के भाव बदलते रहते हैं। और पहिया बेपरवाह हर भाव को अपनें समेटते हुए दौड़ता रहता है।
बड़ी मजेदार है यह ज़िंदगी की गाड़ी।

        (Photo: Sumer Singh Rathore)

Tuesday, 19 April 2016

हवा के रेतीले हाथ

ज्यों ज्यों दिन तप रहे है मुझे अपने रेगिस्तान की ठंडक लिए शामें याद आ रही है। दिन को आग हुई रेत शाम में सुहावनी हो जाती हैं। उस ठंडी रेत के आलिंघन में मोहब्बत हैं।
उस अथाह रेत में आजादी हैं, सपने हैं, मोहब्बत है। दिनभर की गर्म आंधी शाम की ठंडी रेत से टकराकर बालों से टकराती हैं तो लगता है जैसे बाल सहला रही हो। 
इस रेगिस्तानी रेत में अथाह प्रेम हैं।





Wednesday, 13 April 2016

75 शब्दों का पिटारा- ज़िंदगी@75

हमारे पास बहुत सारे सपने और कहानियां हैं, हम समाज, व्यवस्था और अपने आस पास के बारे में सोचते हैं। उसको लिखते हैं। अब ज़िंदगी ठहरी छोटी सी और इस डिजिटल युग में किसी के पास वक्त भी नहीं है कि इतना कुछ पढे।
तो हमने सोचा क्यों ना आपको केवल 75 शब्दों में अपनी बातें सुनाई जाए। और इसके लिए हमने बनाया यह ब्लॉग जिंदगी@75।
Video (Ajay Kumar)
सुनो दोस्त, फीडबैक जरूर दीजिएगा। वही हमारा मेहनताना है।

Tuesday, 12 April 2016

कतरनें वक्त की

समय ने गोता लगा दिया। सोचा हर बार की तरह गुजर जायेगा लेकिन अंतिम वक्त पर उदासियां लिपटने लगी हैं।
अप्रेल का शांत, सुनहरा, आवाज़ों का महिना इस रास्ते का अंतिम पड़ाव बनकर आया है। ज्यों मौसम उदास हो रहा है इस रास्ते में बीते वक्त की कतरने उड़कर चेहरे से टकरा रही हैं।
बहुत अज़ीब था यह रास्ता। समझ ही नहीं आता कि बिना पता चले कब यह बहुत कुछ देकर खत्म हो गया।



शांति की चादर ओढे सफेद पहाड़ों में

खिड़कियों से रोशनी ने झरना बंद कर दिया। सामने वाले पेड़ पर पँछियों ने चहचहाना छोड़ दिया। मैं सो गया था गहरी नींद में।
अचानक सालों बाद एक दिन मैं जग गया सुबह जल्दी। रोशनी झूमकर खिड़की से उतर आई। पँछियों ने मधुर गीत सुनाये।
मैं उठकर देखता रहा पहाड़ों को। सफेद चादर ओढे पहाड़ों को।
मुझे पता है कि एक दिन आयेगा जब मैं इस सुबह को जी रहा होऊंगा। पहाड़, जंगल, गाँव, चहचहाहट।


        (Photo: Sumer Singh Rathore)

Wednesday, 6 April 2016

ज़िंदगी कहीं लॉग-इन छूट गया फेसबुक अकाउंट...

अपनी किताबें और लेपटॉप एक तरफ रख दिये। आधी से ज्यादा रात उसकी आँखों में डूब गई। रात गहराते ही नींद खिड़की से भाग जाती है। पँखा एकटक देखता है उनींदी आँखों को। कभी कभी लगता है ज़िंदगी कम्प्युटर लैब में खुला रह गया फेसबुक अकाउंट है। जहां पर कोई मजाक में आपकी टाइमलाइन से वो शब्द पोस्ट कर जाता है जिनसे नसों में अफीम घुला हो।
सबको सन्मति दे भगवान।
फेसबुक माता की जय।


 (फोटो: सुमेर सिंह राठौड़)

Friday, 1 April 2016

उफ्फ ये परिभाषाएं

लिखना है यार। क्या लिखूंबहुत मुश्किल है लिखना?
मैं जब भी बहुत दिनों बाद लिखने बैठता हूं तो इन्ही सवालों से घिर जाता हूं। लिखने के धंधे में हैं तब लिखना शायद मुश्किल ना हो लेकिन दिल से लिखना हो तो ऐसे ही लिखा जाएगा, दिनों बाद या महिनों बाद कभी-कभी।

आजकल कोशिश करता हूं की समझ लूं लिखने की परिभाषाएं, ताकि बता सकूं क्या लिखा है कविता, कहानी या नज़्म। उफ्फ ये परिभाषाएं।
                                (Photo; Sumer Singh Rathore)

Sunday, 28 February 2016

पँखे की लोरी

अचानक से लगा जैसे कोई हौले-हौले हवा में से सर्दी निकाल रहा है, शामें गर्म होने लगी हैं। पँखे की आवाज़ मुझे एक अज़ीब सा सुकून देती है। नॉस्टेल्जिया टाइप फील होता है।
दिल्ली में यह पहली गर्मी है। गर्मी की रातें सुकून देती है। पँखें की आवाज़ से बाहर का शोर कमरे में दाखिल नहीं हो पाता।
एक एकांतप्रिय मिनख के लिए यह एकांत बहुत प्रिय होता है।रातों को मदहोश करता एकांत।



Saturday, 13 February 2016

मुस्कराहटों के रोने के गीत

उदास सुबहों को मैं पढता हूं नामी लेखकों की मौत को। उनकी कहानियों में खोजता हूं अपना जीवन।
बहुत बार सोचता हूं की सुनूं हवा को, पेड़ों की सरसराहट को, पंछियों को, गिलहरी को, मोहब्बत को और भूल जाऊं अवसाद के सारे गीत। ढूंढता फिरूं सिर्फ खुशियां पर अवसाद है कि किसी कोने से बजने लगता है गाहे बगाहे।
जाने क्यूं कभी-कभी अवसाद के गीत अच्छे लगते हैं। ये मुस्कराहटों के रोने के गीत।


Friday, 5 February 2016

छाँव की ओर बढती बकरियाँ

बकरियों का झुण्ड सूरज के ढलने की दिशा में बढता जाता है।
तेज धूप में  कपड़ा सिली बोतल से ग्वाला पानी गटकता है।
बकरी खींप में मुँह डालकर  पत्तियां चबाती है और
गले की घंटी रेगिस्तान में गूंज उठती है।
मुझे ऐसे ही सपने आते है हमेशा।
मुझे सपना देखते हुए लगता है कि
एक आज़ादी है जिससे हम सब भाग रहे है।
प्रकृति के नज़ारों की आज़ादी।
वनस्पति, धरती आकाश, सबकुछ खुला-खुला अपना सा।