Friday, 27 May 2016
कीप इट सिंपल
Monday, 25 January 2016
गण तंत्र में फंसा हुआ है
गण तंत्र में फंस हुआ है।
आवाज सुनाई दे रही है क्या किसी को मेरी।
यही तो तुम लोगों की प्रॉब्लम है।
आवाज सबकी सुनाई पड़ती है इस तंत्र में थोड़ी या ज्यादा।
लेकिन बोलते काहे नहीं हो यार।
आते काहे नहीं हो हाथ थामने, मदद करने।
हम अपना राग अलापे रहें तुम अपना।
देश का कर दें हैप्पी बड्डे और हाई वॉल्यूम पे गाना सुनें- ये देश है वीर जवानों का।
हैप्पी रिपब्लिक डे।
Thursday, 7 January 2016
बेसब्र सुबह ने शाम को गुनगुनाने न दिया
न जाने कौन सा खेल विधाता रचना चाहता था कि जिस उम्र में उसने ख्वाब बुनने की ताकत को अपनी उरूज़ पर पहुँचाया उस वक़्त हमने गुनगुनाती शामों के ख़्वाब बुने। शामें ही अंत नहीं थीं। हमने चमकती सुबह लाने का भी सपना देखा। लोग कहते थे दोनों पूरक हैं, झूठ है। इन दोनों में विरोध जन्मों पुराना है भले ही सतह पर न दिखे और आखिर बेसब्र सुबह ने शाम को गुनगुनाने न दिया।
Wednesday, 16 December 2015
दत्तानी का नाटक बस दत्तानी का नहीं
उम्मीदें हाथ से छूट जाती हैं। ख़त फड़फड़ाते हुए तेज़ हवा में उड़ जाता है। वक़्त भागता हुआ सामने से निकल जाता है। चाहे जितना पीछा कर लें उतनी रफ़्तार हममें कहाँ?
वो पीछे हम आगे बढ़ते हैं...
हमारे पास रह जाती हैं बस कुछ यादें। यादें जो सहारा बनती हैं जिंदगी का। पर हमेशा नहीं कई दफे यादें ही होती हैं जो दम भी घोंटने लगती हैं। बुरी यादें आसानी से पीछा नहीं छोड़ती।


