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Wednesday, 2 November 2016

नेशन वांट्स टू नो बट व्हाट..!

वो बात करते करते चिल्लाने लगे, और बोले तुम्हें मेरे सवालों का जवाब देना होगा’, मैंने कहा हर सवाल का जवाब दिया है मैंने’, वो बोले नहीं, जवाब तुम्हारे नहीं हमारे होंगे, तुम वही बोलना जो हमें सुनना है, जो देश जानना चाहता है’, मैंने स्तब्ध होकर पूछा देश क्या जानना चाहता है, आप कैसे तय करेंगे?’

वो मुस्कुराकर बोले हम तय करेंगे, क्योंकि हमारी टीआरपी सबसे ज्यादा है, और हम तुमसे ऊंचा बोलते हैं

चित्र: अजय कुमार

Monday, 31 October 2016

राख का रंग...

ख़त जले, किताब जली और जल गयी मेरी दुनिया, अब बस राख बची है, घनी काली राख
जैसे जलने के बाद सबकुछ काला हो जाता है, ठीक वैसे ही सूरज का ढलना और रात का होना, जताता है घने काले रंग की ताकत, वह रंग जिसपर कोई दूसरा रंग नहीं चढ़ता, मैंने अपना लिया है उस राख का रंग, जो राख हमारे खत, किताब और दुनिया की परिणति है, जिसका रंग अब कभी नहीं बदलेगा

चित्र: सुमेर सिंह राठौड़

Thursday, 27 October 2016

'तलाश' खुद की..!

अब निकल चुका हूँ मैं खुद की तलाशमें, बहुत पहले मैंने अपने भीतर जिसे पाया था, लंबे अरसे से उसे फिर नहीं देखा, शायद कहीं खो गया है वो, इस भीड़ में शामिल होते होतेया बन चुका है इसी भीड़ का हिस्सा जिसका होना सिर्फ दिखावा है, जिसकी खुद की कोई सच्चाई या तो होती नहीं और अगर होती है तो शायद कभी दिखती नहीं,
शायद इसी भीड़ में खो गया था मैं...

चित्र : अजय कुमार

Monday, 24 October 2016

ख़त जले या जिंदगी...

उस दिन मैंने जला दिये थे सारे खत तुम्हारे, हरेक हर्फ़ जो हमदोनों की साझा किताब में लिखा जाना था। जिसे हमने न सिर्फ लिखा था बल्कि पिरोया था अपने एहसासों की गर्मी सेवो किताब अभी तक अधूरी है...
मैंने ख़त जला दिए थे मगर पाण्डुलिपि नहीं, क्योंकि उन ख़तों में अभी तक आग बाकी है,
और उस आग से अब तक जल रही है मेरी वो दुनिया, जो कभी हमारी हुवा करती थी.

चित्र: अजय कुमार

Sunday, 25 September 2016

प्रेम में अधिकारों का छिन जाना

नायिका जा रही थी और नायक... चुपचाप देख रहा था। उसे रोक कर अपने आलिंगन पाश में बाँध लेने के लिये, मगर मजबूर था। क्योंकि नायिका ने अपना अंतिम निर्णय सुना दिया था। उधर वो भी बेचैन थी, मन ही मन में उसने कहा 'मैं अभी भी तुम्हारी हूँ', और नायक बस रो पड़ावह सोच रहा था
'किस अधिकार से कहूँ कि तुम मेरी हो? तुमने तो सारे अधिकार ही छीन लिए हैं मुझसे...!'

चित्र : सचिन भाटिया

Saturday, 27 August 2016

स्मार्ट शहर

अरसे बाद जब मैं अपने शहर पहुंचा तो देखा वहां सड़कों पर गढ्ढे नहीं थे बिजली भी कभी कभी कटती थी। हर जरूरी चीज अब आसानी से मिलने लगी, यहाँ तक की अच्छी नौकरी भी। लेकिन चिलचिलाती धूप से जलती गगनचुम्बी कंक्रीट की दीवारों में वो सुकून नहीं मिला जिसके लिये मैं वापस लौटा था। गंगा में पहले जैसा प्रवाह भी नहीं था। जानते हो क्यों?
क्योंकि मेरा शहर अब स्मार्ट सिटी बनने वाला है।

चित्र : अजय कुमार 

Friday, 15 July 2016

लो मैंने जला दिये सारे ख़त तुम्हारे

लो जला दिये मैंने वो सारे ख़त तुम्हारे, हर एक हर्फ़, जो तुमने मुझसे कहा था। और वो सभी पंक्तियाँ जो मुझे सबसे ज्यादा सुकून देती थीं। अब सब कुछ जल गया, मेरे स्वाभिमान के तेज से या यूँ कहूँ कि मेरे क्रोध की ज्वाला में,
पर ये तो कुछ शब्द थे चन्द पंक्तियाँ थीं जो कागज पर लिखी थीं
मगर उस एहसास का क्या जो इन शब्दों में हम दोनों ने मिलकर पिरोया था।

चित्र : अजय कुमार

Saturday, 18 June 2016

इंतज़ार...

इंतज़ार... भला तुम क्या जानो क्या होता है? तुम्हें तो कभी जरूरत ही नहीं पड़ी इंतज़ार करने की। और मेरे लिए तो बेशक, कभी इंतज़ार नहीं करना पड़ा तुम्हें। जब भी तुमने चाहा मैं हमेशा तुम्हारे पास था। भैतिक रूप से ना सही पर मेरा आभास था। शायद इसीलिए तुम नहीं जानते इंतज़ार की अहमियत। जब एक एक पल सूए की नोक सा चुभने लगे तो समझ लेना तुम भी इंतज़ार करना सीख गये हो।

चित्र: अजय कुमार

Monday, 25 April 2016

बिखरने और जुड़ने के क्रम में...

हर रोज़ टूटने और जुड़ने की आदत सी हो गयी है। अक्सर टूट कर बिखर जाता हूँ। बिखर जाता हूँ आईने सा चकनाचूर होकर। शायद बिखरना ही मेरा दस्तूर हो गया है। खुद से खफा होकर निकल पड़ता हूँ शहर की भीड़ में। देखता हूँ कुछ बच्चों को कुछ बूढों को कुछ बेघर बेसहारा लोगों को। जिनकी जिन्दगी में संघर्ष तो है पर मौज भी। मौज है उस शांति की जिसे मैं खोजने निकला हूँ

चित्र : अजय कुमार

तुम... एक पहेली और हम.. हम खुली किताब

कितनी अजीब बात है न,

सबको पता हैं मैं तुमसे प्रेम करता हूँ, पर तुम हो कि समझने की कोशिश भी नही करती। सच कहूँ तो तुम मेरी समझ के परे हो। कभी-कभी लगता है जैसे "तुम एक पहेली हो जिसे मैं शायद कभी सुलझा ही न पाऊँ और मैं, मैं एक खुली किताब, जिसे तुम पढ़ने की कोशिश ही नहीं करती" बस ये किताब खुद ही तुमसे अपनी व्याख्या करने को बेताब रहती है।
PC: Peeyush

Wednesday, 13 April 2016

75 शब्दों का पिटारा- ज़िंदगी@75

हमारे पास बहुत सारे सपने और कहानियां हैं, हम समाज, व्यवस्था और अपने आस पास के बारे में सोचते हैं। उसको लिखते हैं। अब ज़िंदगी ठहरी छोटी सी और इस डिजिटल युग में किसी के पास वक्त भी नहीं है कि इतना कुछ पढे।
तो हमने सोचा क्यों ना आपको केवल 75 शब्दों में अपनी बातें सुनाई जाए। और इसके लिए हमने बनाया यह ब्लॉग जिंदगी@75।
Video (Ajay Kumar)
सुनो दोस्त, फीडबैक जरूर दीजिएगा। वही हमारा मेहनताना है।

Sunday, 10 April 2016

...उदासी...

सूरज ढल रहा था और मेरे मन का उत्साह भी। आसमान के साथ मुझपर भी अंधेरा छा रहा था। मैं खोया हुआ महसूस कर रहा था जैसे किरणों के साथ ही ख़त्म हो जायेगी मेरी जिंदगी से रौशनी भी। कहीं दूर जैसे झरने से गिरता पानी पत्थरों को गहरी चोट दे रहा हो ठीक वैसा ही दर्द मेरे अंदर उठ रहा था। दर्द भी ऐसा जो चीर दे। ये एहसास ये दर्द मेरी उदासी थी।

चित्र : अजय कुमार


Thursday, 7 April 2016

हाल-ए-दिल, इजहार से पहले

जानती हो?
मैं शायद डूब सा चुका हूँ, तुम्हारे रूप के सागर में। कभी कभी तैरने की कोशिश करता हूँ और उस पार जाना चाहता हूँ लेकिन अब आभास होता है कि डूब जाऊंगा क्योंकि तुम मुझे बहुत ज्यादा कंफ्यूज करती हो मैं समझ नहीं पाता कि अपने मन की बात तुमसे कैसे कहूँ और ये भी कितनी अजीब बात है ना? एक तुमको छोड़कर बाकी सब जानते हैं कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ


चित्र : अजय कुमार

आखिर किस क़दर बदल गई है जिंदगी।

जलन होती थी मुझे 
उन आंसुओं से जो तुम्हारे गुलाबी गालों को चूमकर तुम्हारे होठों को भिंगा देते थे। दर्द होता था मुझे जब तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान नहीं होती थी। बेचैन हो जाता था मैं, जब कभी तुम्हारे होंठो को छूकर कर एक भी आवाज़ मेरे कान में नहीं पड़ती और दिन बीत जाता था। कल तक मैं तुम्हें देखे बिना रह नही पाता था और आज तुम्हारे सामने आने की हिम्मत नहीं रही।

चित्र : अजय कुमार