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Friday, 17 March 2017

केदारजी की कविताओं में दूब

केदारनाथ सिंह के लिए पृथ्वी मनुष्य का घर है इसीलिए यह सुन्दर और समर्थ है। केदारजी की कविताओं में अकाल में भी दूब बची रह जाती है। दूब में आशा-विश्वास और जीवन सौन्दर्य की अनुभूति है। दुःख अनिवार्य है इसीलिए केदार जी की कविताओं में वह सहज-साधारण और खूबसूरत है। अगर स्मृति और साहस हो तो दुःख के बीच से ही आनंद का रास्ता फूटता है।

“अभी बहुत कुछ बचा है
अगर बची है दूब”
P.C.-Peeyush Parmar

Thursday, 16 March 2017

सुर का संघर्ष

परिंदे को एक गीत गाना था। गीत का ऊंचा सुर अपराध था, इसलिए गवाह बुलाए गए। उसने आकाश को आवाज दी और रची एक अपनी जमीन। उसके गीत से बारिश हुई, बारिश से उसके पंख भींगे, भींगे पंखों से उसने एक ऊंची उड़ान भरी। इंसान की आत्माएं मर रही थीं। परिंदे ने गीत का सबसे ऊंचा आपराधिक सुर इंसान की आत्मा की सांस से जोड़ा और बसंत लिए जीवन लौट आया। दुनिया खूबसूरत हो गयी।
P.C.- Peeyush Parmar

Monday, 31 October 2016

एनकाउंटर का बुखार आया है...

दाग दाग उजाला ...

धाँय धाँय की आवाज...मार डालो काट डालो चीर डालो फाड़ डालो
इंसान नहीं हैं हम ... जानवर थे जानवर हैं
हम एक धर्म बनायेंगें ... लोगों को लूटेंगें
हम एक राष्ट्र बनायेंगें ... लोगों को मारेंगें
अमेरिका मुर्दाबाद ... हमें अमेरिका बनना है।
गाँधी जिंदाबाद ... हमें गोडसे की मूर्ति बनानी है।

चश्मों से दुनियाँ देखेंगें ... रंगीन दिखेगी 
17 मारो या 1700 तुम हत्यारे हो और हम बुझदिल

मारो ……………………………………………………………………………………
चित्र : सुमेर

Friday, 28 October 2016

क्रांति की साइकिल

JNU के विद्रोही जी मर गए लेकिन उनकी आत्मा अकलेश में घुस गयी और उन्होंने समाजवादी तरीके से सामन्तवादी परिवार से विदरोह कर दिया। पहली बार समाजवादी पार्टी में साम्यवादी क्रांति का प्रयोग हुआ है। कहाँ गए मार्क्स चचा के विरोधी जो कहते थे क्रांति नहीं होगी। जॉइंट फैमिली टूट रही है... खबर है कि समाजवादी पार्टी को जोडे रखने में RSS मदद करेगी ताकि संयुक्त परिवार की भारतीय संस्कृति सुरक्षित रहे। सब गोलमाल है।

Thursday, 20 October 2016

प्यार को गवाही की जरुरत नहीं

क्या आज सब कुछ कह दूँ ...? रात के अँधेरे से तुम्हें रोशनी की तरह देखना. डायरी के पन्ने पर तुम्हारे नाम लिखी अनेको अनभेजी चिठ्ठियों के शब्द. वह गीत जो मैंने गाया था गौरय्ये की जुगलबंदी में नदी के निर्झर तान के साथ. जाड़े की उस सुबह की बात जो धुंध के कारण मेरी नज़र तुमसे कह नहीं पाई.
लेकिन क्या ये सब कहना जरुरी है ?
अदालत में दी जाने वाली गवाही की तरह ! 
P.C.-Sumer Singh Rathore

Sunday, 28 August 2016

पानी का गीत और रेत की धुन

जाड़े के मौसम में वह बसंत की तरह आया था और मैंने उसे रात के एकांत में महसूस किया. सुबह मुलायम-सा सूरज निकला तो वह रोशनी की किरन बना और मैं दूब पर पड़ी ओस की बूंद और हमने मिलकर रचा एक अनंत दूरी का इन्द्रधनुष. धूप की बारिश में मैंने गंगा के गीत गाए और उसने रेत की धुन छेड़ी. वक्त ने छुट्टी की घंटी बजायी और प्रेम  जन्म के पूर्व ही निर्वासित हुआ.
PC : Sumer

Friday, 19 August 2016

पानी के किनारे कहानी

गाँव के ताल का पानी उतर गया था और ताल के किनारे कुत्तों का एक समूह कबड्डी के खेल की नक़ल उतार रहा था. ताल के बगल वाली नहर ने थोड़ा सा गर्भजल बचा रखा था ताकि नए प्रवाह का जन्म संभव हो सके. इन्सान की आवाजाही की कमी ने सूनेपन को और गहरा कर दिया था. पानी का उतर जाना जिंदगी का उतर जाना होता है चाहे वह ताल का हो या आँख का.
चित्र : पीयूष 
 

Monday, 11 July 2016

हवा में हिलता अस्तित्व

जहाज में आवाज का नामोनिशान नहीं था। अंदर आदमी थे पर बनावटी चुप्पी से सने हुए और बाहर सफ़ेद बादल जो आत्मा के साथ बकबक किये जा रहे थे। जमीन का आँखों के सामने न होना भयावह था और आसमान का और दूर होना दुखद। हवा गति देती है और अस्तित्व भी। जमीन स्पर्श देती है और सहारा भी। हवा में अस्तित्व की तलाश आसान लगती है। हम त्रिशंकु की भूमिका में आत्मविश्लेषण करते हैं।
PC : Peeyush 

ईद की मुबारकबाद मुहब्बत के लिए...

ठांय ठांय की अावाज से गूंजता अासमान, लाल रंग मे रंगी सेवइयां, सफेद पैरहन पर जुलेखा के अाँसुओं के धब्बे और अांखों के पानी मे हिलती दुनियाँ। अाज ईद है और मैनें अपनी सारी प्रार्थनाएँ और मुबारकबाद मुहब्बत के लिए बचा कर रख ली है। एक पूरी रात केवल चांद को देखो और एक कविता लिखो। अगर तुम्हारे अंदर मुहब्बत के लिए प्रार्थना है तो वह दुनियाँ की सबसे खूबसूरत कविता होगी। मुहब्बत जिंदाबाद रहे।

(फोटो: सुमेर)

Friday, 10 June 2016

"पिया तोरा कैसा अभिमान"

तुम अपनी आँखों से हमेशा मेरे लिए एक महाकाव्य रचती हो पर जब सामने आती हो तो एक अर्द्ध अनजान हवा की तरह सरसराती निकल जाती हो। क्या तुम मेरे लिए एक कठिन प्रश्न हो या हर उस सवाल का जवाब हो जिससे मेरा अस्तित्व संभव हो पाता है? तुम्हारी नज़र मेरी प्रेरणा है और तुम्हारी निःशब्दता मेरी जिजीविषा। तुम्हारे अभिमान के प्रश्न में मैं जीवन का जवाब ढूँढ रहा हूँ.

चित्र : सुमेर 

Tuesday, 24 May 2016

तुम्हारा साथ ही मेरा स्वप्न है

यमुना का दिल गंगा में डूब गया है। एक नदी जो किसी की आँख से बह निकली थी, आज मेरे जीवन का अस्तित्व गढ़ती है। सृजन का अधूरापन ही उसका प्राण है। संभावनाएं उसकी साँस बनती हैं। मैं तुम्हारी अनादि सर्जना हूँ और तुम मेरी अनन्त सम्भावना। सुबह के निरभ्र आकाश की नीलिमा तुम्हारे आँखों की गवाही है। तुम दूर हो और मैं मजबूर लेकिन सुबह की नींद में तुम्हारा साथ ही मेरा स्वप्न है।
चित्र : पीयूष

Sunday, 24 April 2016

रात की नदी और अज्ञेय चेतना

रात आधी बीत चुकी है। कमरे में एक सन्नाटा है जिसको पंखे की हवा चीर देती है। खिड़की के बाहर की दुनियां अँधेरे में कहीं गुम हो गयी है। नदी दूर चली गयी है और रेगिस्तान अब दोस्त बनता जा रहा है। कल 'आषाढ़ का एक दिन' है। मुक्तिबोध सी द्वन्दात्मक चेतना ही नियति है। किताब के पन्ने पलटते ही जिंदगी का एक अध्याय समाप्त हो गया। जीवन यात्रा आपको अज्ञेय बना कर छोड़ेगी। हवा...
चित्र साभार : पीयूष परमार 

Wednesday, 13 April 2016

75 शब्दों का पिटारा- ज़िंदगी@75

हमारे पास बहुत सारे सपने और कहानियां हैं, हम समाज, व्यवस्था और अपने आस पास के बारे में सोचते हैं। उसको लिखते हैं। अब ज़िंदगी ठहरी छोटी सी और इस डिजिटल युग में किसी के पास वक्त भी नहीं है कि इतना कुछ पढे।
तो हमने सोचा क्यों ना आपको केवल 75 शब्दों में अपनी बातें सुनाई जाए। और इसके लिए हमने बनाया यह ब्लॉग जिंदगी@75।
Video (Ajay Kumar)
सुनो दोस्त, फीडबैक जरूर दीजिएगा। वही हमारा मेहनताना है।

लाल आलता और लाल बेर

अँगुलियों का रंग लाल था और मुठ्ठी में लाल रंग की बेर भरी थी होठों पर लाल रंग की चमक और आँखों में लाल चुहलपन भरकर उसने एकबार देखा और पूरब की छत पर एक सूरज निकलकर झांकने लगा बेर की खटास पूरे सृष्टि में फ़ैल गयी थी मुँह और आँख में पानी था सिन्दूर की एक रेख उत्तर से चढ़कर दक्खिन में कहीं उतर कर गुम हो गयी और मैं अकेले खड़ा रह गया

         (Photo: Sumer Singh Rathore)
 

Sunday, 10 April 2016

बब्बन काका का नीम पेड़

गाँव में पुराना नीम का पेड़ कट गया। पेड़ के कटने के अगले ही दिन बब्बन काका चल बसे। उसके बाद कभी चौपाल नहीं बैठी। आग हर जगह जल रही थी पर उसके चारो ओर बैठकर बात करने के लिए मन नहीं थे। शहर के साज की आवाज से गाँव गूँज रहा है। डिस्को के शोर में कीर्तन भूल चुके हैं हम क्यों कि राम अब बब्बन काका का राम नहीं बल्कि एक नेता है।

          (Photo: Sumer Singh Rathore)

Monday, 4 April 2016

मौत की गोद में मेरा गवाह

जेएनयू की सुनसान सड़क और उस पर मैं और तुम। पेड़ खड़े हैं और हमारी जिद्द के सामने वे सब भी अड़े हैं। रात को बुलाने के लिए सुबह ने शाम को भेजा है। तुम्हारी सिगरेट से जिंदगी धुँआ धुँआ हो गयी है। कोहरा सिगरेट की पाइप पर दम तोड़ लाश बन जाता है और कान में आके कह जाता है कि मैं मर भले ही गया हूँ पर इस शाम की गवाही जरूर दूँगा।

चित्र साभार : अजय कुमार 

 

Friday, 1 April 2016

तुम्हारी आँख ही मेरी कहानी है

अनजानी राह का पथिक हूँ। आजकल तुम्हारी आँखों की ही कहानियों को गुनगुनाता रहता हूँ। कल जब सूरज अंतिम बार मुझसे विदा ले रहा होगा तुम जरूर आना। मैं अँधेरे में तुम्हारी कहानियों के बगैर नहीं रह सकता। तुम्हारी अनुपस्थिति मुझे हमेशा डराती रहती है। आँखों की काली रेखा सवाल पैदा करती है। दुनियाँ के सवालों के बोझ से मेरे कँधे दुःख रहे हैं। मुझे अब ऑक्सीजन की जरुरत है जो कि तुम्हारी साँस है।
(Sumer Singh Rathore)

Monday, 28 March 2016

गाँव मेरा दिल-हाय मेरा दिल

रात गहरी होती जा रही थी. बाबूजी की खाँसी की आवाज़ की ठनक भी बढ़ती जा रही थी. खेत सूख गए थे और भविष्य वीरान हो गया था. गौरइया गायब थी और आसमान में एक जहाज़ उड़ रहा था. समंदर इंतज़ार में था और नदी लापरवाह हो गई थी. छाँव थी पर जुल्फों का अता पता नहीं था. साँसों को गिन के देख लेता हूँ कि मेरे दिल का कितना हिस्सा मेरे पास बचा है.



Thursday, 17 March 2016

मेरा दोस्त

एक दोस्त है। दूर है नाराज़ है। वह चाँद को पसंद करता है और मैं जमीन को। वह वक्त को मुट्ठी में बंद कर लेना चाहता है और मैं वक्त की धार में बहना चाह रहा हूँ। उसे नींद प्यारी है और मुझे जागृति। वह सम्पूर्ण बनना चाहता है और अधूरापन ही मेरी नियति है। वह गलती करना नहीं चाहता और मुझे गलतियों से सीखना अच्छा लगता है लेकिन वह मेरा है और मैं उसका।



Tuesday, 8 March 2016

पंडवानी@DU

70 साल की औरत और महाभारत के रण की घनघोर गर्जना सी आवाज। तीजन बाई होना उम्र को चुनौती देना है। संगीत की लय में पिरोया गया एकल नाट्य अभिनय रंगमंच को नया 'स्पेस' उपलब्ध कराता है। पंडवानी लोक है जहाँ गति प्रवाह और जिजीविषा है। पंडवानी अतीत की याद है साथ ही भविष्य का स्वप्न भी। पंडवानी छत्तीसगढ़ की एक साँस है जिसकी भागीदारी भारत के जीवन में है। लोक दिल्ली पहुँच गया है।

चित्र साभार : अविनाश द्विवेदी