साहिल पर खड़ा हूँ
पर नाव का इंतजार नहीं है। चीख चीख कर रोना चाहता हूँ पर पुरुषत्व का पाखंडी विचार
मुझे रोने नहीं देता। क्या रोना ही विकल्प है? हम चीख क्यों नहीं सकते? जब बेचैनियों के
दरिया से सन्नाटे का सागर लबरेज़ हो चूका है तो क्यों नहीं हम फूंक देते हैं सभी
चुप्पियों की चादर जो जाति धर्म के रंग में रंगी गयी हैं और जिनसे हमारा मानस ढँक
दिया गया है।

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