Wednesday, 30 December 2015

ज़िंदगी चरखा

ज़िंदगी भी चरखे की मानिंद है। जब तक चरखा चलता है बुनता रहता है और जब रुक जाता है तो बस रुक जाता है।
ठीक उसी तरह ज़िंदगी में रंगो भरे धागे बुनने के लिए हमारा चलते रहना भी जरूरी है। इस दौड़ में हम तब तक ही है जब तक हम चल रहे है। रुक गये कि हो गये बाहर।
इसलिए चलते रहिए दौड़ते रहिए बस रुकिए मत ताकि जीवन मे रंगत बनी रहे।

          (फोटो: सुमेर सिंह राठौड़)

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