JNU के विद्रोही जी मर गए लेकिन उनकी
आत्मा अकलेश में घुस गयी और उन्होंने समाजवादी तरीके से सामन्तवादी परिवार से विदरोह
कर दिया। पहली बार समाजवादी पार्टी में साम्यवादी क्रांति का प्रयोग हुआ है। कहाँ गए
मार्क्स चचा के विरोधी जो कहते थे क्रांति नहीं होगी। जॉइंट फैमिली टूट रही है... खबर
है कि समाजवादी पार्टी को जोडे रखने में RSS मदद करेगी ताकि संयुक्त परिवार की भारतीय
संस्कृति सुरक्षित रहे। सब गोलमाल है।
Friday, 28 October 2016
Thursday, 27 October 2016
जल थल जी में तू ही विराजे
अकेले नहीं होते हम कारवाँ में? राह में जो हाथ पकड़े छोड़ जाते हैं वो साथी होते हैं?
साल भर बाद अचानक से वो रास्ता रिवाइंड हो जाता है
और हम ढूंढते हैं हाथ पर निशान कि अब भी राह में वो हाथ पकड़े चल रहे है।
गहराई रात में धूआं, छूटता हाथ
और बैकड्रॉप में गा रहा कबीर 'जहाँ देखूं तू का तू'।
सुनो इस राह में सब मुसाफिर है, नए मुसाफिर सफर मुबारक।
'तलाश' खुद की..!
अब निकल चुका हूँ मैं ‘खुद की तलाश’ में, बहुत पहले
मैंने अपने भीतर जिसे पाया था, लंबे अरसे से उसे फिर नहीं देखा, शायद कहीं खो गया है वो, इस भीड़ में शामिल होते होते, या बन चुका है इसी भीड़ का हिस्सा जिसका होना सिर्फ दिखावा है,
जिसकी खुद की कोई सच्चाई या तो होती नहीं और अगर होती है तो शायद
कभी दिखती नहीं,
शायद इसी भीड़ में खो गया था मैं...
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| चित्र : अजय कुमार |
Monday, 24 October 2016
ख़त जले या जिंदगी...
उस
दिन मैंने जला दिये थे सारे खत तुम्हारे, हरेक हर्फ़ जो
हमदोनों की साझा किताब में लिखा जाना था। जिसे हमने न सिर्फ लिखा था बल्कि पिरोया
था अपने एहसासों की गर्मी से, वो किताब अभी तक अधूरी है...
मैंने ख़त जला दिए थे मगर पाण्डुलिपि नहीं, क्योंकि उन ख़तों
में अभी तक आग बाकी है,
और उस आग से अब तक जल रही है मेरी वो
दुनिया, जो कभी हमारी हुवा करती थी.
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| चित्र: अजय कुमार |
Thursday, 20 October 2016
प्यार को गवाही की जरुरत नहीं
क्या आज सब कुछ कह दूँ ...? रात के अँधेरे से तुम्हें रोशनी की
तरह देखना. डायरी के पन्ने पर तुम्हारे नाम लिखी अनेको अनभेजी चिठ्ठियों के शब्द.
वह गीत जो मैंने गाया था गौरय्ये की जुगलबंदी में नदी के निर्झर तान के साथ. जाड़े
की उस सुबह की बात जो धुंध के कारण मेरी नज़र तुमसे कह नहीं पाई.
लेकिन क्या ये सब कहना जरुरी है ?
Sunday, 25 September 2016
प्रेम में अधिकारों का छिन जाना
नायिका जा रही थी और नायक... चुपचाप देख रहा था। उसे रोक कर अपने आलिंगन
पाश में बाँध लेने के लिये, मगर मजबूर था। क्योंकि नायिका ने अपना अंतिम निर्णय
सुना दिया था। उधर वो भी बेचैन थी, मन ही मन में उसने कहा 'मैं अभी भी तुम्हारी हूँ', और नायक बस रो पड़ा, वह सोच रहा था
'किस अधिकार से कहूँ कि तुम
मेरी हो? तुमने तो सारे अधिकार ही छीन लिए हैं मुझसे...!'
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| चित्र : सचिन भाटिया |
Sunday, 28 August 2016
पानी का गीत और रेत की धुन
जाड़े के मौसम में वह बसंत की
तरह आया था और मैंने उसे रात के एकांत में महसूस किया. सुबह मुलायम-सा सूरज निकला
तो वह रोशनी की किरन बना और मैं दूब पर पड़ी ओस की बूंद और हमने मिलकर रचा एक अनंत
दूरी का इन्द्रधनुष. धूप की बारिश में मैंने गंगा के गीत गाए और उसने रेत की धुन
छेड़ी. वक्त ने छुट्टी की घंटी बजायी और प्रेम जन्म के पूर्व ही निर्वासित हुआ.
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| PC : Sumer |
Saturday, 27 August 2016
स्मार्ट शहर
अरसे बाद जब मैं अपने शहर
पहुंचा तो देखा वहां सड़कों पर गढ्ढे नहीं थे बिजली भी कभी कभी कटती थी। हर जरूरी
चीज अब आसानी से मिलने लगी, यहाँ तक की अच्छी नौकरी भी। लेकिन
चिलचिलाती धूप से जलती गगनचुम्बी कंक्रीट की दीवारों में वो सुकून नहीं मिला जिसके
लिये मैं वापस लौटा था। गंगा में पहले जैसा प्रवाह भी नहीं था। जानते हो क्यों?
क्योंकि मेरा शहर अब
स्मार्ट सिटी बनने वाला है।Friday, 19 August 2016
पानी के किनारे कहानी
गाँव के ताल का पानी उतर
गया था और ताल के किनारे कुत्तों का एक समूह कबड्डी के खेल की नक़ल उतार रहा था.
ताल के बगल वाली नहर ने थोड़ा सा गर्भजल बचा रखा था ताकि नए प्रवाह का जन्म संभव हो
सके. इन्सान की आवाजाही की कमी ने सूनेपन को और गहरा कर दिया था. पानी का उतर जाना
जिंदगी का उतर जाना होता है चाहे वह ताल का हो या आँख का.
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| चित्र : पीयूष |
Monday, 8 August 2016
खोने वाले लौट आते हैं क्या?
अचानक बादल काले हो गए। हवा रुक गई, पत्तों का शोर बंद हो गया। पीला गुबार दिखने लगा। बवंडर आ गया। पंछी चिल्लाने लगे। बंवडर के साथ आई तेज बारिश। पेड़ पर सफेद गालों वाली बुलबुल गाने लगी, बूंदों के साथ जुगलबंदी करके। पत्ते झरने लगे। सब कुछ हरा था। और एक दिन बुलबुल खो गई। पत्ते झड़ गए। गर्म हवा झुलसाने लगी। जाने कब फिर बदलेगा मौसम। खोने वाले कभी तो लौट आते होंगे?
(फोटो: सुमेर)
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