Monday, 29 February 2016

किसान : पिता की भूमिका में एक पुत्र

किसान घर में कभी भी नहीं रोता। क्यों? वह आँसू के बूंद खेत के लिए बचाकर रख लेता है कि अगर भगवान दगा दे गए तो शायद ये काम आ जाएँ। वह ऑफिस में जाता है तो ऊँचाई पर नहीं बैठता क्यों कि वह जानता है कि अधिक ऊँचाई से दुनियाँ बहुत छोटी लगती है पर ऊँचाई उसी जमीन पर खड़ी होती है। किसान एक पुत्र होता है पर हमेशा पिता की भूमिका निभाता है।



कहानियों का शहर

यह शहर कहानियों का शहर है। यहाँ बसतीं हैं कहानियां, अनगिनत कहानियां, इंसानों से अधिक कहानियां। सड़क पर चलते, बस में सफ़र करते, या मेट्रो रेल में, 'हर रोज़ दिखती हैं हज़ारों कहानियां। हर आदमी के पास कोई न कोई कहानी है। हर आदमी बेताब है अपनी सुनाने को। बस यही बात है इस शहर की यहाँ कहानियां सुनाने की उत्सुकता है सुनने की नहीं, और इसी तरह मर जातीं हैं बहुत सी कहानियां अनकही।

चित्र : अजय कुमार 

Sunday, 28 February 2016

पँखे की लोरी

अचानक से लगा जैसे कोई हौले-हौले हवा में से सर्दी निकाल रहा है, शामें गर्म होने लगी हैं। पँखे की आवाज़ मुझे एक अज़ीब सा सुकून देती है। नॉस्टेल्जिया टाइप फील होता है।
दिल्ली में यह पहली गर्मी है। गर्मी की रातें सुकून देती है। पँखें की आवाज़ से बाहर का शोर कमरे में दाखिल नहीं हो पाता।
एक एकांतप्रिय मिनख के लिए यह एकांत बहुत प्रिय होता है।रातों को मदहोश करता एकांत।



Saturday, 20 February 2016

मंटो@मंडी हाउस

टोबा टेक सिंह कहाँ हैं? 68 साल बाद भी यह सवाल लाखों 'इंसानों' के ख्याल में गूँज रहा है। विभाजन में लकीर होती है लेकिन दर्द इस बात का ज्यादा है कि हम उस लकीर पर खड़े नहीं हो सकते। हमें उसे आर करना होता है या पार। मंटो आज भी इस सवाल का जवाब ढूंढ रहा है कि मिलजुलकर रहने वालों का वह  जमीन-ए-आसमाँ कहाँ हैं जहाँ सूरज अँधेरे की बजाय उजाला देता है।
चित्र साभार : अजय कुमार 
 
 

Tuesday, 16 February 2016

प्यार में कबीर होना

अगर आपको धूप चुभती है तो आपने सर्दियाँ नहीं देखी और अगर आपको सर्द लग रही हो तो आपने सूरज से कभी नज़रें नहीं मिलायीं हैं। जब राह चलते चलते अँधेरा हो जाए और परछाई भी अपरिचित की तरह आँखों में गड़ने लगे तो समझिए प्यार हो गया है। किताबें पढ़ न रहे हो और वह लिफाफे की तरह दिखायी देतीं हों हर किसी की नब्ज़ गर्म हो तो समझो कबीर होना ही किस्मत थी।
Songs of Sumera
 

Saturday, 13 February 2016

मुस्कराहटों के रोने के गीत

उदास सुबहों को मैं पढता हूं नामी लेखकों की मौत को। उनकी कहानियों में खोजता हूं अपना जीवन।
बहुत बार सोचता हूं की सुनूं हवा को, पेड़ों की सरसराहट को, पंछियों को, गिलहरी को, मोहब्बत को और भूल जाऊं अवसाद के सारे गीत। ढूंढता फिरूं सिर्फ खुशियां पर अवसाद है कि किसी कोने से बजने लगता है गाहे बगाहे।
जाने क्यूं कभी-कभी अवसाद के गीत अच्छे लगते हैं। ये मुस्कराहटों के रोने के गीत।


Tuesday, 9 February 2016

कबीर@मंडी हाउस

आज कबीर आया था, नीरू और नीमा को पूछ रहा था। कह दूँ कि सभ्यता के सभ्य होने की प्रसव पीड़ा में दोनों मर गए। सभ्य होने की प्रक्रिया में नाजायज़ कुछ भी नहीं होना चाहिए। कबीर! आज भी मनुष्य से अधिक पवित्रता प्यारी है। तुम्हारा आना आज सौन्दर्य का विषय है, सत्य का नहीं क्यों कि आज सबका सत्य अलग है और मालिक भी। तुम्हारे जाने के बाद काशी ही मगहर हो गयी कबीर!
चित्र साभार : अजय कुमार 

Saturday, 6 February 2016

टिक...टिक...टिक

12 टिक टिक 3 टिक टिक 6 टिक टिक...  

यहाँ पोस्ट पढ़ते रहने की बजाय घड़ी देखना ज्यादा बेहतर विकल्प है आपका देखना आपके बीतने की क्रिया है घड़ी टिक टिक की आवाज आपको सावधान करने के लिए करती है दरअसल घड़ी को अगर लंका मान लिया जाये तो समय रावण और टिक की आवाज विभीषण की उपमा पा जाने में सक्षम है राम बनकर जीतना है तो कान लगाकर मित्रवत टिक टिक सुनो ! 
   

प्रश्न ही नियति है !

वक्त का बीतना क्यों जरुरी है? क्या वक्त के साथ हम भी बीत जायेंगें? क्या गिर जायेंगें भविष्य के स्वप्न लेकर अतीत के पाताल में? क्या रास्ते के बिना नहीं पहुँच सकते प्यारी मंज़िल तलक? क्या वर्तमान संघर्ष का पर्याय बना रहेगा हमेशा हमेशा के लिए? अगर हाँ तो क्यों अगर नहीं तो रास्ता क्या है?
         क्या हमारी नियति मात्र प्रश्न से ही निर्धारित होगी? वक्त आ गया है कि सभी प्रश्न मिटा दिए जाएँ...तुरंत  
चित्र : पीयूष परमार 

Friday, 5 February 2016

छाँव की ओर बढती बकरियाँ

बकरियों का झुण्ड सूरज के ढलने की दिशा में बढता जाता है।
तेज धूप में  कपड़ा सिली बोतल से ग्वाला पानी गटकता है।
बकरी खींप में मुँह डालकर  पत्तियां चबाती है और
गले की घंटी रेगिस्तान में गूंज उठती है।
मुझे ऐसे ही सपने आते है हमेशा।
मुझे सपना देखते हुए लगता है कि
एक आज़ादी है जिससे हम सब भाग रहे है।
प्रकृति के नज़ारों की आज़ादी।
वनस्पति, धरती आकाश, सबकुछ खुला-खुला अपना सा।


Tuesday, 2 February 2016

न्याय मात्र एक यंत्र है

यह जगत सम्बन्ध का परिणाम है। धरती के अस्तित्व में आसमान का भी अंश है जैसे घर में वासी का। सृष्टि का पेड़ न्याय की मिट्टी पर ही खड़ा है। न्याय भी एक तरह का संबंध निर्धारक है जो दो पक्ष के मध्य के संबंध-संतुलन का मापक है।  लेकिन इस विचार का मूल यह है कि न्याय तो मात्र एक यंत्र है, कार्य और परिणाम का निर्धारण तो मात्र दोनों पक्ष ही कर सकते हैं।

Monday, 1 February 2016

शहर महबूबा सा

किसी शहर से अढाई बरस तक रूठे रहना और बिछड़ने के बाद मुहब्बत हो जाना कितनी अजीब सी बात है।
जयपुर शहर के साथ कुछ ऐसा ही रिश्ता है मेरा। इसके गुलाबीपन में आप कब खो जाएंगे पता ही नहीं चलता। शहर की ज़िंदगी और गाँव की ज़िंदगी के बीच खड़े इस मेट्रो शहर की पुरानी इमारतों में एक ज़ादू भरा है और नई इमारतों में खिंचाव।
मैं खोया हूं इस शहर के ज़ादू में।
(फोटो: सुमेर सिंह राठौड़)