Monday, 11 July 2016

ये रास्ते हैं कि शतरंज की चालें

खुद के होने को ढूंढना सबसे कठिन काम है। मैं हर रात खुद को बड़ी मुश्किल से खोज निकालता और अगली शाम तक फिर से तलाश रहा होता हूं अपना वजूद।
कई बार किसी जगह हम खुद से डर जाते हैं। फिर उस जगह हम कभी सहज हो ही नहीं पाते। 
बहुत मुश्किल खेल है यह। इसे खेलने के लिए शातिर होना पड़ता है। मैं खुद को खोजता हूं तो शातिरपना मुझे नकार देता है।
(फोटो: सुमेर)

हवा में हिलता अस्तित्व

जहाज में आवाज का नामोनिशान नहीं था। अंदर आदमी थे पर बनावटी चुप्पी से सने हुए और बाहर सफ़ेद बादल जो आत्मा के साथ बकबक किये जा रहे थे। जमीन का आँखों के सामने न होना भयावह था और आसमान का और दूर होना दुखद। हवा गति देती है और अस्तित्व भी। जमीन स्पर्श देती है और सहारा भी। हवा में अस्तित्व की तलाश आसान लगती है। हम त्रिशंकु की भूमिका में आत्मविश्लेषण करते हैं।
PC : Peeyush 

ईद की मुबारकबाद मुहब्बत के लिए...

ठांय ठांय की अावाज से गूंजता अासमान, लाल रंग मे रंगी सेवइयां, सफेद पैरहन पर जुलेखा के अाँसुओं के धब्बे और अांखों के पानी मे हिलती दुनियाँ। अाज ईद है और मैनें अपनी सारी प्रार्थनाएँ और मुबारकबाद मुहब्बत के लिए बचा कर रख ली है। एक पूरी रात केवल चांद को देखो और एक कविता लिखो। अगर तुम्हारे अंदर मुहब्बत के लिए प्रार्थना है तो वह दुनियाँ की सबसे खूबसूरत कविता होगी। मुहब्बत जिंदाबाद रहे।

(फोटो: सुमेर)

Saturday, 18 June 2016

इंतज़ार...

इंतज़ार... भला तुम क्या जानो क्या होता है? तुम्हें तो कभी जरूरत ही नहीं पड़ी इंतज़ार करने की। और मेरे लिए तो बेशक, कभी इंतज़ार नहीं करना पड़ा तुम्हें। जब भी तुमने चाहा मैं हमेशा तुम्हारे पास था। भैतिक रूप से ना सही पर मेरा आभास था। शायद इसीलिए तुम नहीं जानते इंतज़ार की अहमियत। जब एक एक पल सूए की नोक सा चुभने लगे तो समझ लेना तुम भी इंतज़ार करना सीख गये हो।

चित्र: अजय कुमार

Friday, 10 June 2016

"पिया तोरा कैसा अभिमान"

तुम अपनी आँखों से हमेशा मेरे लिए एक महाकाव्य रचती हो पर जब सामने आती हो तो एक अर्द्ध अनजान हवा की तरह सरसराती निकल जाती हो। क्या तुम मेरे लिए एक कठिन प्रश्न हो या हर उस सवाल का जवाब हो जिससे मेरा अस्तित्व संभव हो पाता है? तुम्हारी नज़र मेरी प्रेरणा है और तुम्हारी निःशब्दता मेरी जिजीविषा। तुम्हारे अभिमान के प्रश्न में मैं जीवन का जवाब ढूँढ रहा हूँ.

चित्र : सुमेर 

Saturday, 4 June 2016

ज़ेहन के रोजनामचे में दर्ज नाम

'मैं समय हूं।'
मैं हंसता था यह सुनकर। पर अब समय हंस रहा है। कम वक्त में चीज़ें इधर की उधर हो जाती है। रिश्तों की परिभाषा बदल जाती है।
समय जैसे रबर हो। हम पेंसिल छीलकर लिखते जाते हैं सुंदर शब्द और रब्बर मिटाता जाता है। यह कहते हुए कि लिखे को भूलकर और लिखो।
पर जो अमिट छप गया कैसे मिट सकता है। ज़ेहन के रोजनामचे में दर्ज है जो होगा हिसाब उसका।



बरगद यहां भी है पर वो छांव नहीं

टूटी पुरानी चारपाई। उस पर पड़ा मैं देखता रहता बरगद को। दिन का सबसे गर्म वक्त। बरगद के पत्तों की आवाज़ें। गौरेया और सफेद गालों वाली बुलबुल की चहचहाहट।
बरगद यहां भी होते हैं पर उनके नीचे वो छांव नहीं होती। अब गर्मियां चुभती हैं। दिन तो गुम ही हो गये। उनींदी रातें होती हैं। मशीन हुआ जाता शरीर लुढकता रहता है इधर उधर। 
कुछ तो फर्क है भले ही स्टेट ऑफ मांइड कह दो।


Friday, 27 May 2016

कीप इट सिंपल

बिंब ही बांधने हैं तो भइया कवि बन जाओ. क्या जरुरत है जबरदस्ती गद्य में फैल मचाने की. लोगों का वक्त खाओगे बस. लिख सकते हो तो सिंपल लिखो ताकि सब तक पहुंचे. पर ऐसा लिखो कि वो लड़का जो 10वीं में 3 बार फेल हुआ, वो भी तुम्हें पढ़ना चाहे और पढ़ने के बाद अपनी पांचवीं पास अम्मा को भी पढ़ाये. उसकी अम्मा जब तुम्हें आसानी से समझ लेगी तभी तुम्हारा लिखा सार्थक होगा.

Tuesday, 24 May 2016

तुम्हारा साथ ही मेरा स्वप्न है

यमुना का दिल गंगा में डूब गया है। एक नदी जो किसी की आँख से बह निकली थी, आज मेरे जीवन का अस्तित्व गढ़ती है। सृजन का अधूरापन ही उसका प्राण है। संभावनाएं उसकी साँस बनती हैं। मैं तुम्हारी अनादि सर्जना हूँ और तुम मेरी अनन्त सम्भावना। सुबह के निरभ्र आकाश की नीलिमा तुम्हारे आँखों की गवाही है। तुम दूर हो और मैं मजबूर लेकिन सुबह की नींद में तुम्हारा साथ ही मेरा स्वप्न है।
चित्र : पीयूष

Monday, 2 May 2016

सफ़ेद बादल और कौओं के गीत

सुबहें चहचहाहट भूल गई। चरम पर पहुंची गर्मी में ठंडा शरीर खिड़की पर लुढका रहता है। कातर निगाहों से सफेद बादल को गुजर जाने तक तकती हैं आँखें।
सुनो किसी को झूठा इंतिज़ार कभी मत करवाना। जिसकी छोटी सी दुनिया हो उसके लिए छोटे-छोटे वादे भी बहुत बड़े होते हैं।
दोपहरों में गौरेया नहीं बोलती, कौओं के गीत उदास होते हैं। तुम दुआ करना मेरे लिए बड़ी दुनिया की ताकि छोटे वादे भूल जाऊं।

       (फोटो: सुमेर)