(फोटो: सुमेर)
Monday, 8 August 2016
खोने वाले लौट आते हैं क्या?
अचानक बादल काले हो गए। हवा रुक गई, पत्तों का शोर बंद हो गया। पीला गुबार दिखने लगा। बवंडर आ गया। पंछी चिल्लाने लगे। बंवडर के साथ आई तेज बारिश। पेड़ पर सफेद गालों वाली बुलबुल गाने लगी, बूंदों के साथ जुगलबंदी करके। पत्ते झरने लगे। सब कुछ हरा था। और एक दिन बुलबुल खो गई। पत्ते झड़ गए। गर्म हवा झुलसाने लगी। जाने कब फिर बदलेगा मौसम। खोने वाले कभी तो लौट आते होंगे?
Friday, 15 July 2016
लो मैंने जला दिये सारे ख़त तुम्हारे
लो
जला दिये मैंने वो सारे ख़त तुम्हारे, हर
एक हर्फ़, जो तुमने मुझसे कहा था। और वो सभी पंक्तियाँ जो मुझे सबसे
ज्यादा सुकून देती थीं। अब
सब कुछ जल गया, मेरे स्वाभिमान के तेज से या यूँ कहूँ
कि मेरे क्रोध की ज्वाला में,
पर
ये तो कुछ शब्द थे चन्द पंक्तियाँ थीं जो कागज पर लिखी थीं
Monday, 11 July 2016
लौटने के लिए आते हैं पर कभी लौट नहीं पाते हैं
हम चले आते हैं लौटने की ख़्वाहिशें
लेकर लेकिन कभी लौट नहीं पाते।
कल डॉक्युमेंट्री देखी थी ताण बेकरो।
जोगी, भील और कालबेलिया जनजातियों पर बनी है।
सवालों के जवाब देते हुए खुद पर
गुस्सा आ रहा था। क्या इन जनजातियों के कोई हक़ नहीं हैं।
इनसे परम्पराएं तो छूट गई पर आधुनिक
ना हो पाए। लटक गए बीच में।
कितना कठिन जीवन है बिना शिक्षा, बिजली,
घर और रोटी के।
फिर भी मुस्कराते हैं।
ये रास्ते हैं कि शतरंज की चालें
खुद के होने को ढूंढना सबसे कठिन काम है। मैं हर रात खुद को बड़ी मुश्किल से खोज निकालता और अगली शाम तक फिर से तलाश रहा होता हूं अपना वजूद।
कई बार किसी जगह हम खुद से डर जाते हैं। फिर उस जगह हम कभी सहज हो ही नहीं पाते।
बहुत मुश्किल खेल है यह। इसे खेलने के लिए शातिर होना पड़ता है। मैं खुद को खोजता हूं तो शातिरपना मुझे नकार देता है।
हवा में हिलता अस्तित्व
जहाज में आवाज का नामोनिशान नहीं था। अंदर आदमी थे पर बनावटी चुप्पी
से सने हुए और बाहर सफ़ेद बादल जो आत्मा के साथ बकबक किये जा रहे थे। जमीन का आँखों
के सामने न होना भयावह था और आसमान का और दूर होना दुखद। हवा गति देती है और अस्तित्व
भी। जमीन स्पर्श देती है और सहारा भी। हवा में अस्तित्व की तलाश आसान लगती है। हम त्रिशंकु
की भूमिका में आत्मविश्लेषण करते हैं।
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| PC : Peeyush |
ईद की मुबारकबाद मुहब्बत के लिए...
ठांय ठांय की अावाज से गूंजता
अासमान, लाल रंग मे रंगी सेवइयां, सफेद पैरहन पर जुलेखा के अाँसुओं के धब्बे और अांखों
के पानी मे हिलती दुनियाँ। अाज ईद है और मैनें अपनी सारी प्रार्थनाएँ और मुबारकबाद
मुहब्बत के लिए बचा कर रख ली है। एक पूरी रात केवल चांद को देखो और एक कविता लिखो।
अगर तुम्हारे अंदर मुहब्बत के लिए प्रार्थना है तो वह दुनियाँ की सबसे खूबसूरत कविता
होगी। मुहब्बत जिंदाबाद रहे।
Saturday, 18 June 2016
इंतज़ार...
इंतज़ार... भला तुम क्या जानो क्या
होता है? तुम्हें तो कभी जरूरत ही नहीं पड़ी इंतज़ार करने की। और मेरे लिए तो बेशक, कभी
इंतज़ार नहीं करना पड़ा तुम्हें। जब भी तुमने चाहा मैं हमेशा तुम्हारे पास था। भैतिक
रूप से ना सही पर मेरा आभास था। शायद इसीलिए तुम नहीं जानते इंतज़ार की अहमियत। जब एक
एक पल सूए की नोक सा चुभने लगे तो समझ लेना तुम भी इंतज़ार करना सीख गये हो।
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| चित्र: अजय कुमार |
Friday, 10 June 2016
"पिया तोरा कैसा अभिमान"
तुम अपनी आँखों से हमेशा मेरे लिए एक महाकाव्य रचती
हो पर जब सामने आती हो तो एक अर्द्ध अनजान हवा की तरह सरसराती निकल जाती हो। क्या
तुम मेरे लिए एक कठिन प्रश्न हो या हर उस सवाल का जवाब हो जिससे मेरा अस्तित्व
संभव हो पाता है? तुम्हारी नज़र मेरी प्रेरणा है और
तुम्हारी निःशब्दता मेरी जिजीविषा। तुम्हारे अभिमान के प्रश्न में मैं जीवन का
जवाब ढूँढ रहा हूँ.
| चित्र : सुमेर |
Saturday, 4 June 2016
ज़ेहन के रोजनामचे में दर्ज नाम
'मैं समय हूं।'
मैं हंसता था यह सुनकर। पर अब समय हंस रहा है। कम
वक्त में चीज़ें इधर की उधर हो जाती है। रिश्तों की परिभाषा बदल जाती है।
समय जैसे रबर हो। हम पेंसिल छीलकर लिखते जाते हैं
सुंदर शब्द और रब्बर मिटाता जाता है। यह कहते हुए कि लिखे को भूलकर और लिखो।
पर जो अमिट छप गया कैसे मिट सकता है। ज़ेहन के
रोजनामचे में दर्ज है जो होगा हिसाब उसका।
बरगद यहां भी है पर वो छांव नहीं
टूटी पुरानी चारपाई। उस पर पड़ा मैं देखता रहता बरगद
को। दिन का सबसे गर्म वक्त। बरगद के पत्तों की आवाज़ें। गौरेया और सफेद गालों वाली
बुलबुल की चहचहाहट।
बरगद यहां भी होते हैं पर उनके नीचे वो छांव नहीं
होती। अब गर्मियां चुभती हैं। दिन तो गुम ही हो गये। उनींदी रातें होती हैं। मशीन
हुआ जाता शरीर लुढकता रहता है इधर उधर।
कुछ तो फर्क है भले ही स्टेट ऑफ मांइड कह दो।
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