Saturday, 18 June 2016

इंतज़ार...

इंतज़ार... भला तुम क्या जानो क्या होता है? तुम्हें तो कभी जरूरत ही नहीं पड़ी इंतज़ार करने की। और मेरे लिए तो बेशक, कभी इंतज़ार नहीं करना पड़ा तुम्हें। जब भी तुमने चाहा मैं हमेशा तुम्हारे पास था। भैतिक रूप से ना सही पर मेरा आभास था। शायद इसीलिए तुम नहीं जानते इंतज़ार की अहमियत। जब एक एक पल सूए की नोक सा चुभने लगे तो समझ लेना तुम भी इंतज़ार करना सीख गये हो।

चित्र: अजय कुमार

Friday, 10 June 2016

"पिया तोरा कैसा अभिमान"

तुम अपनी आँखों से हमेशा मेरे लिए एक महाकाव्य रचती हो पर जब सामने आती हो तो एक अर्द्ध अनजान हवा की तरह सरसराती निकल जाती हो। क्या तुम मेरे लिए एक कठिन प्रश्न हो या हर उस सवाल का जवाब हो जिससे मेरा अस्तित्व संभव हो पाता है? तुम्हारी नज़र मेरी प्रेरणा है और तुम्हारी निःशब्दता मेरी जिजीविषा। तुम्हारे अभिमान के प्रश्न में मैं जीवन का जवाब ढूँढ रहा हूँ.

चित्र : सुमेर 

Saturday, 4 June 2016

ज़ेहन के रोजनामचे में दर्ज नाम

'मैं समय हूं।'
मैं हंसता था यह सुनकर। पर अब समय हंस रहा है। कम वक्त में चीज़ें इधर की उधर हो जाती है। रिश्तों की परिभाषा बदल जाती है।
समय जैसे रबर हो। हम पेंसिल छीलकर लिखते जाते हैं सुंदर शब्द और रब्बर मिटाता जाता है। यह कहते हुए कि लिखे को भूलकर और लिखो।
पर जो अमिट छप गया कैसे मिट सकता है। ज़ेहन के रोजनामचे में दर्ज है जो होगा हिसाब उसका।



बरगद यहां भी है पर वो छांव नहीं

टूटी पुरानी चारपाई। उस पर पड़ा मैं देखता रहता बरगद को। दिन का सबसे गर्म वक्त। बरगद के पत्तों की आवाज़ें। गौरेया और सफेद गालों वाली बुलबुल की चहचहाहट।
बरगद यहां भी होते हैं पर उनके नीचे वो छांव नहीं होती। अब गर्मियां चुभती हैं। दिन तो गुम ही हो गये। उनींदी रातें होती हैं। मशीन हुआ जाता शरीर लुढकता रहता है इधर उधर। 
कुछ तो फर्क है भले ही स्टेट ऑफ मांइड कह दो।